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रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्त्तक सन्त  कवि दरियाव जी / दरिया साहब

                                                                                                                                    राधेश्याम रावोरिया                      


दरियाव जी

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राजस्थान का नागौर जनपद शुरु से संतों व भक्तों की पावनभूमि के रुप में जाना जाता रहा है। इन संतों ने विविध संप्रदायों को अस्तित्व में लाया। इन संप्रदायों में रामस्नेही संप्रदाय बहुत बड़ा अवदान रहा है।

रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्त्तक सन्त दरियाव  साहब थे। उनका प्रादुर्भाव १८ वीं शताब्दी में हुआ। साधारण जन को लोकभाषा में धर्म के मर्म की बात समझाकर, एक सुत्र में पिरोने में इस संप्रदाय से जुड़े लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन संतों ने हिंदू- मुसलमान, जैन- वैष्णव, द्विज- शूद्र, सगुण-निर्गुण, भक्ति व योग के द्वन्द्व को समाप्त कर एक ऐसे समन्वित सरल मानवीय धर्म की प्रतिष्ठापना की जो सबके लिए सुकर एवं ग्राह्य था। आगे चलकर मानवीय मूल्यों से सम्पन्न इसी धर्म को "रामस्नेही संप्रदाय' की संज्ञा से अभिहित किया गया।

रेण- रामस्नेही संप्रदाय में शुरु से ही गुरु- शिष्य की परंपरा चलती आयी है। इनका सिद्धांत संत दरियाजी के सिद्धांतों पर आधारित उनके अनुयायियों ने इनका प्रचार- प्रसार देश के विभिन्न भागों में निरंतर करते रहे। इस संप्रदाय के प्रमुख संतों का उल्लेख इस प्रकार है -

दरियाव जी / दरिया साहब

नागौर जिले में रामस्नेही संप्रदाय की परंपरा संत दरियावजी से आरंभ होती है। इनका जन्म राजस्थान राज्य के जैतारण गाँव में वि.सं. १७३३ ( ई. १६७६ ) की भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, बुधवार को हुआ था। इनके पिता का नाम मानसा तथा माता का नाम गीगा था। ये पठान धुनिया थे।

मुरधर देस भरतखण्ड मांई, जैतारण एक गाँव कहाई।
जात पठाण रहत दोय भाई, फतेह मानसा नाम कहाई।।

-- दरियाव महाराज के जन्म चरण की परची

पिता मानसा सही, माता गीगा सो कहिये।
बण सुत को घर बुदम जात धुणियां जो लहिये।।

-- दरियाव महाराज की जन्मलीला
( ह.ग्रंथ, रा.प्रा.वि.प्रतिष्ठान, जोधपुर )

खुद दरिया साहब ने अपनी बाणी में कहा है -

जो धुनियां तो भी मैं राम तुम्हारा।
अधम कमीन जाति मतिहीना, तुम तो हो सिरताज हमारा।।

-- दरिया बाणी पद

प्रेमदास की कृपा से दरिया के सारे जंजाल मिट गये --

सतगुरु दाता मुक्ति का दरिया प्रेमदयाल।
किरपा कर चरनों लिया मेट्या सकल जंजाल।।

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